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मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये देखना है कि पत्थर कहां से आया है?

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वैसे तो मई 2014 में प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी के सुशोभित होने के बाद ही देश में इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि क्या भारतवर्ष हिंदुत्ववादी राजनीति की गिर$ त में आने जा रहा है? परंतु गत् वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारत की आत्मा धर्मनिरपेक्ष थी और धर्मनिरपेक्ष ही रहेगी। इसके बाद पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर देश में 2014 जैसा ही राजनैतिक वातावरण पैदा कर दिया। हालांकि पंजाब में कांग्रेस पार्टी अपनी वापसी कर पाने में सफल तो ज़रूर रही परंतु जिस तरीके से उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड राज्यों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा हुआ तथा जिस तत्परता व जुगाड़बाज़ी के साथ गोवा व मणिपुर में भी भाजपा ने अपने परचम लहराए उसे देखने के बाद एक बार फिर राजनैतिक समीक्षक देश को हिंदूवादी विचारधारा की ओर बढ़ता हुआ देखने लगे। खासतौर पर उनका संदेह उस समय विश्वास में बदलने लगा जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए सप्ताह भर चली जद्दोजहद के बाद फायरब्रान्ड हिंदुत्ववादी नेता योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश के मु यमंत...

देश को लोहिया की विचारधारा की जरूरत

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-चरण सिंह राजपूत/ केंद्र व देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश समेत कई प्रदेश में संघियों की सरकार बनने पर समाजवाद के नाम पर राजनीति कर रहे नेताओं को अपने संघर्ष, कार्यशैली और विचारधारा पर मंथन की जरूरत है। यदि आज फिरकापरस्त ताकतों के चलते साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका महसूस की जा रही है, उसके लिए कहीं न कहीं समाजवादी भी दोषी हैं। गैर कांग्रेसवाद का नारा तो समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दिया था पर जब देश में कांग्रेस कमजोर हुई तो संघी सत्ता पर कैसे काबिज हो गए। संघर्ष के लिए जाने जाने वाले समाजवादियों से संघियों ने गैर कांग्रेसवाद का नारा कैसे छीन लिया। जेपी आंदोलन के बाद सत्ता में आई जनता पार्टी में शामिल होने वाले संघियों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनाकर अपने को इतना कैसे मजबूत कर लिया कि समाजवादी कहीं पीछे रह गए। कैसे-कैसे समाजवादी कमजोर हुए। कैसे-कैसे समाजवादी विचारधारा से भटके। कैसे उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव जीतकर भी हार गए। कैसे नीतीश कुमार गैर संघवाद का नारा देकर शांत पड़ गए। आज इन सब पर मंथन की जरूरत है। क्यों जनता समाजवादियों से दूर ...

आजादी के महान नायक सरदार भगत सिंह

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-लाल बिहारी लाल/ भगत सिंहका जन्म एक सिख परिवार में 28 सितम्बर 1907 को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदारकिशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था।भदत सिंहबाल्य काल से ही अपने चाचा के पुस्तकालय से क्रातिकारी किताबे पढते थे पर इसकेसमर्थक नहीं थे। लेकिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की घटना सुनकर भगत सिंह ने अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकरजलियाँवाला बागपहुँच गये। इस घटना से भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा। लाहौर केनेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी में अपनायोगदान देने के लियेनौजवान भारत सभाकी स्थापना की । काकोरी काण्ड मेंराम प्रसाद 'बिस्मिल'सहित 4 क्रान्तिकारियों कोफाँसी एंव 16 अन्य को कारावास की सजा से भगत सिंह काफी आहतहुए।1928 मेंसाइमन कमीशनके बहिष्कार के लिये भयानकप्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भीकिया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकरलाला लाजपत रायकी मृत्यु हो गयी।  अब इनसे रहान गया और एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्टस्काट को मारने की योजना सोची। इस सोची गयी योजन...

लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था पर 'लोक विश्वास' सबसे ज़रूरी

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-निर्मल रानी/ यह एक कड़वा सच है कि हमारे देश के सत्ताधीश आसानी से सत्ता से अलग नहीं होना चाहते। यही वजह है कि जब चुनाव में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ता है तो वे अपनी हार की नाना प्रकार की दलीलें पेश करने लगते हैं। ऐसा ही एक सबसे आसान बहाना या दलील यह भी है कि चुनाव में बेईमानी की गई या चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी अथवा वोटिंग मशीन के माध्यम से घोटाला किया गया आदि। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद भी ऐसी ही आवाज़ बुलंद की गई। इस बार ईवीएम अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में धांधली का आरोप लगाने वाली सबसे मुखरित आवाज़ उत्तर प्रदेश की पूर्व मु यमंत्री व बहुजन समाज पार्टी प्रमुख सुश्री मायावती की थी। इसके पश्चात उत्तराखंड में अपनी हार का मुंह देखने वाले हरीश रावत ने तथा पंजाब में प्रत्याशित सफलता प्राप्त न कर पाने वाले आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी मायावती के सुर से अपना सुर मिलाते हुए ईवीएम की विश्वसनीयता पर उंगली उठाई। सीधेतौर पर यह कहा जा सकता है कि चूंकि इन तीनों ही नेताओं की पार्टियों ने अपने-अपने राज्यों में पराजय क...

आजादी आन्दोलन के विप्लवी योद्धा :भगतसिंह

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शहीद -ए -आजम भगतसिंह का जीवन संघर्ष एक मिसाल है। सिर्फ 23 वर्ष की अवस्था में शहीद हुए भगतसिंह ने शोषण पर टिकी व्यवस्था को बदलने के लिए स्वयं को अर्पित कर दिया। उन्होंने न केवल देश की परिस्थिति  को गम्भीरता से समझा, बल्कि क्रांतिकारी आदर्श को एक वैचारिक आधार दिया। इंकलाब जिंदाबाद का उनका नारा आज भी शोषण के खिलाफ लड़ने वालों के लिए प्रेरणास्रोत है। भगतसिंह एक ऐसी व्यवस्था लाना चाहते थे जहां मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण न हो, किसी को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए तरसना न पड़े।    भगतसिंह का जन्म पंजाब प्रांत( अब पाकिस्तान ) के लायलपुर जिले में बंगा नामक गांव में 28 सितंबर 1907 को हुआ था। उनके  पिता सरदार किशन सिंह प्रसिद्ध देशभक्त थे। सरदार किशन सिंह ऐसे कामों में लगे रहते जो सीधे तौर पर राजनीतिक न होने पर भी भारतीयता और भाईचारे को मजबूत करता था। वे अपने भाई अजीत सिंह के साथ कांग्रेस के गरम दल में भी शामिल थे। माता विद्यावती एक अद्भुत साहसी और निडर महिला थी। देश सेवा की भावना उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी।भगतसिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह बड़े क्रांतिकारी नेत...

जरा याद करो कुर्बानी.......

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(शहादत दिवस पर विशेष) आज देश जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि लोग आजादी की कीमत को भूल गए हैं। भूल गए हैं कि इस देश को आजाद कराने में कराने में कितनी माओं ने अपने लाल खो दिये। कितनी महिलाओं की मांग सूनी हो गई। कितने बहनों ने अपने भाई खोल दिए। कितने पिताओं ने अपने अरमान खो दिए। कितने युवाओं को मौत के घाट उतार दिया गया। कितने युवाओं ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। वोटबैंक की राजनीति, सत्ता की लालसा ने देश के बुनियादी मुद्दों को पीछे धकेल कर दिया है। जिस तरह से नेता, नौकरशाह और अवसरवादी लोग देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। जिस तरह से देश को चलाने के लिए बनाए गए तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जिस तरह से देशभक्ति का अभाव देखा जा रहा है। लोगों का जमीर बिकता जा रहा है। पैसे कमाने की ललक के चलते आदमी कोई भी कीमत चूकाने को तैयार बैठा है। ऐसे में तो ऐसा ही लग रहा है कि देश की आजादी में क्रांतिकारियों के दिए गए बलिदानों का इस देश के लोगों पर कोई असर नहीं है। इस देश के कर्णधार आजादी के दीवानों के प्रति कितने गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता...

सूर्यकुमार शुक्ला हो सकते नये डीजीपी

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-के.पी. सिंह / उत्तर प्रदेश में भाजपा ने भूतो नभविष्यतो बहुमत हासिल किया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा को इतने बड़े पैमाने पर बहुमत मिला है कि पार्टी के नेताओं ने भी जिसकी कल्पना नहीं की थी। यह बहुमत हिंदू मॉडल के सामाजिक ढांचे की बहाली के लिए कुछ वर्गों की उत्कट अभिलाषा की देन है। जिन्होंने आस्था के नाम पर उनको भी अपने साथ बड़े ज्वार के रूप में समेट लिया जिनकी आक्रामक चेतना हाल के वर्षों में उनके लिए सबसे ज्यादा चुभने वाली चीज रही है और यह तथाकथित मुस्लिम तुष्टिकरण के विरुद्ध बहुसंख्यक आबादी के मन में जमा हो रहे गुबार के धमाकेदार विस्फोट का भी नतीजा है। ऐसे में प्रभावी प्रशासन और अभिनव विकास की कसौटी का कोई बहुत मूल्य नहीं रह जाता। जैसा कि इस चुनाव में हुआ भी है। मोदी सरकार के तमाम दुखदायी प्रयोगों के बावजूद भाजपा के अश्मेघ यज्ञ के घोड़े की लगाम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नहीं थामी जा सकी और अब तो मोदी के कट्टर आलोचक भी मान चुके हैं कि उनका जादू इस कदर छाया हुआ है कि अभी एक-डेढ़ दशक तक उसमें उतार की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। फिर भी मोदी अपनी ओर से पूरी तरह सतर्क हैं। द...