जरा याद करो कुर्बानी.......
(शहादत दिवस पर विशेष)
आज देश जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि लोग आजादी की कीमत को भूल गए हैं। भूल गए हैं कि इस देश को आजाद कराने में कराने में कितनी माओं ने अपने लाल खो दिये। कितनी महिलाओं की मांग सूनी हो गई। कितने बहनों ने अपने भाई खोल दिए। कितने पिताओं ने अपने अरमान खो दिए। कितने युवाओं को मौत के घाट उतार दिया गया। कितने युवाओं ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
वोटबैंक की राजनीति, सत्ता की लालसा ने देश के बुनियादी मुद्दों को पीछे धकेल कर दिया है। जिस तरह से नेता, नौकरशाह और अवसरवादी लोग देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। जिस तरह से देश को चलाने के लिए बनाए गए तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जिस तरह से देशभक्ति का अभाव देखा जा रहा है। लोगों का जमीर बिकता जा रहा है। पैसे कमाने की ललक के चलते आदमी कोई भी कीमत चूकाने को तैयार बैठा है। ऐसे में तो ऐसा ही लग रहा है कि देश की आजादी में क्रांतिकारियों के दिए गए बलिदानों का इस देश के लोगों पर कोई असर नहीं है।
इस देश के कर्णधार आजादी के दीवानों के प्रति कितने गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकतर क्रांतिकारियों के परिजन फटेहाल में हैं और देश से गद्दारी करने वालों के परिजन एशोआराम और अय्याशी की जिंदगी बिता रहे हैं। ऐसे में निश्चित रूप से उन क्रांतिकारियों की आत्मा रो रही होगी, जिन्होंने इस देश को आजाद कराने में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। वैसे तो देश को आजाद कराने में न जाने कितने क्रांतिकारियों ने अपने प्राणाों की आहूति दी है पर सरदार भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की शहादत का कोई जोड़ नहीं। यह शहादत युवाओं में देश की आजादी का जज्बा भरने के लिए दी गई थी।
देश के आजाद होने पर खुली सांस लेने वाले लोगों को इन क्रांतिकारियों की कुर्बानी को समझना होगा। समझना होगा कि जब इन तीनों क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 की शाम को ही फांसी दे गई तो अंग्रेजों ने जनता में बगावत के डर से इन तीनों क्रांतिकारियों के शवों को उनके परिजनों को देने के बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में काटा और सतलुज नदी पर केरोसीन में जलाने लगे। वह तो भला हो वहां के स्थानीय लोगों का, जिन्होंने शोर मचाकर इन क्रांतिकारियों के शवों को छीनकर अंग्रेजों को खदेड़ा और विधिवत रूप से इन क्रांतिकारियों का अंतिम संस्कार किया। यह तो एक उदाहरणमात्र है इस देश को आजाद कराने में देश ने बड़ी कीमत चुकाई है, उसे समझने की जरूरत है। भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव में से देश भगत सिंह को ज्यादा जानता है। इसकी वजह यह थी कि भगत सिंह वैचारिूक रूप से बहुत मजबूत थे।
जब देशभक्ति की बात आती है तो सरदार भगत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अब पड़ोसियों के घर में भगत सिंह के पैदा होने की सोच से काम नहीं चलेगा। अब देश के लिए हर मां को भगत सिंह पैदा करना होगा। भगत सिंह ऐसे नायक थे, जिनकी सोच यह थी कि उनकी शहादत के बाद ही युवाओं में देश की आजादी के प्रति जुनून जगेगा। हुआ भी यही भगत सिंह के फांसी दिए जाने के बाद देश का युवा अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतर आया और अंग्रेजों को खदेड़ कर ही दम लिया।
भगत सिंह का नाम आते ही हमारे जहन में बंदूक से लैस किसी क्रांतिकारी की छवि उभरने लगती है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि २३ वर्ष की अल्पायु में भी वह हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंग्ला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ, चिन्तक और विचारक तो थे ही, समाजवाद के मुखर पैरोकार भी थे। आज की व्यवस्था और राजनेताओं की सत्तालिप्सा को देखकर लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि इससे तो बेहतर ब्रितानवी हुकूमत थी पर भगत सिंह ने 1930 में यह बात महसूस कर ली थी। उन्होंने कहा था कि हमें जो आजादी मिलेगी, वह सत्ता हस्तांतरण के रूप में ही होगी। गरीबी पर पर लोग भले ही महात्मा गांधी के विचारों को ज्यादा तवज्जो देते हों पर भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में गरीबी को न केवल अभिशाप बताया था बल्कि पाप तक की संज्ञा दे दी थी। आज भी भगत सिंह अपने विचोरों की ताजगी से सामायिक और प्रासंगिक ही लगते हैं।
भगत सिंह को अधिकतर लोग क्रांतिकारी देशभक्त के रूप में जानते हैं पर वह सिर्फ एक क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कला के धनी, दार्शनिक, चिन्तक, लेखक और पत्रकार भी थे। बहुत कम आयु में उन्होंने फ्रांस, आयरलैंड और रुस की क्रांतियों का गहन अध्ययन किया था। लाहौर के नेशनल कालेज से लेकर फांसी की कोठरी तक उनका यह अध्ययन लगातार जारी रहा कि और यही अध्ययन था जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करता है कि उन्हें हम और क्रांतिकारी दार्शनिक के रूप में जानते हैं। भगत सिंह के भीतर एक प्रखर अखबारनवीस भी था, जिसकी बानगी हम प्रताप जैसे अख़बारों के सम्पादन में देख सकते हैं। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि एक महान विचारक के ये महत्वपूर्ण विचार देश के तथाकथित कर्णधारों के षडयंत्र के फलस्वरूप अब तक उन लोगों तक नहीं पहुच पाए जिनके लिए वह शहीद हुए थे।
वोटबैंक की राजनीति, सत्ता की लालसा ने देश के बुनियादी मुद्दों को पीछे धकेल कर दिया है। जिस तरह से नेता, नौकरशाह और अवसरवादी लोग देश को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। जिस तरह से देश को चलाने के लिए बनाए गए तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जिस तरह से देशभक्ति का अभाव देखा जा रहा है। लोगों का जमीर बिकता जा रहा है। पैसे कमाने की ललक के चलते आदमी कोई भी कीमत चूकाने को तैयार बैठा है। ऐसे में तो ऐसा ही लग रहा है कि देश की आजादी में क्रांतिकारियों के दिए गए बलिदानों का इस देश के लोगों पर कोई असर नहीं है।
इस देश के कर्णधार आजादी के दीवानों के प्रति कितने गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकतर क्रांतिकारियों के परिजन फटेहाल में हैं और देश से गद्दारी करने वालों के परिजन एशोआराम और अय्याशी की जिंदगी बिता रहे हैं। ऐसे में निश्चित रूप से उन क्रांतिकारियों की आत्मा रो रही होगी, जिन्होंने इस देश को आजाद कराने में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। वैसे तो देश को आजाद कराने में न जाने कितने क्रांतिकारियों ने अपने प्राणाों की आहूति दी है पर सरदार भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव की शहादत का कोई जोड़ नहीं। यह शहादत युवाओं में देश की आजादी का जज्बा भरने के लिए दी गई थी।
देश के आजाद होने पर खुली सांस लेने वाले लोगों को इन क्रांतिकारियों की कुर्बानी को समझना होगा। समझना होगा कि जब इन तीनों क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 की शाम को ही फांसी दे गई तो अंग्रेजों ने जनता में बगावत के डर से इन तीनों क्रांतिकारियों के शवों को उनके परिजनों को देने के बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में काटा और सतलुज नदी पर केरोसीन में जलाने लगे। वह तो भला हो वहां के स्थानीय लोगों का, जिन्होंने शोर मचाकर इन क्रांतिकारियों के शवों को छीनकर अंग्रेजों को खदेड़ा और विधिवत रूप से इन क्रांतिकारियों का अंतिम संस्कार किया। यह तो एक उदाहरणमात्र है इस देश को आजाद कराने में देश ने बड़ी कीमत चुकाई है, उसे समझने की जरूरत है। भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव में से देश भगत सिंह को ज्यादा जानता है। इसकी वजह यह थी कि भगत सिंह वैचारिूक रूप से बहुत मजबूत थे।
जब देशभक्ति की बात आती है तो सरदार भगत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अब पड़ोसियों के घर में भगत सिंह के पैदा होने की सोच से काम नहीं चलेगा। अब देश के लिए हर मां को भगत सिंह पैदा करना होगा। भगत सिंह ऐसे नायक थे, जिनकी सोच यह थी कि उनकी शहादत के बाद ही युवाओं में देश की आजादी के प्रति जुनून जगेगा। हुआ भी यही भगत सिंह के फांसी दिए जाने के बाद देश का युवा अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतर आया और अंग्रेजों को खदेड़ कर ही दम लिया।
भगत सिंह का नाम आते ही हमारे जहन में बंदूक से लैस किसी क्रांतिकारी की छवि उभरने लगती है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि २३ वर्ष की अल्पायु में भी वह हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंग्ला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ, चिन्तक और विचारक तो थे ही, समाजवाद के मुखर पैरोकार भी थे। आज की व्यवस्था और राजनेताओं की सत्तालिप्सा को देखकर लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि इससे तो बेहतर ब्रितानवी हुकूमत थी पर भगत सिंह ने 1930 में यह बात महसूस कर ली थी। उन्होंने कहा था कि हमें जो आजादी मिलेगी, वह सत्ता हस्तांतरण के रूप में ही होगी। गरीबी पर पर लोग भले ही महात्मा गांधी के विचारों को ज्यादा तवज्जो देते हों पर भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में गरीबी को न केवल अभिशाप बताया था बल्कि पाप तक की संज्ञा दे दी थी। आज भी भगत सिंह अपने विचोरों की ताजगी से सामायिक और प्रासंगिक ही लगते हैं।
भगत सिंह को अधिकतर लोग क्रांतिकारी देशभक्त के रूप में जानते हैं पर वह सिर्फ एक क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कला के धनी, दार्शनिक, चिन्तक, लेखक और पत्रकार भी थे। बहुत कम आयु में उन्होंने फ्रांस, आयरलैंड और रुस की क्रांतियों का गहन अध्ययन किया था। लाहौर के नेशनल कालेज से लेकर फांसी की कोठरी तक उनका यह अध्ययन लगातार जारी रहा कि और यही अध्ययन था जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करता है कि उन्हें हम और क्रांतिकारी दार्शनिक के रूप में जानते हैं। भगत सिंह के भीतर एक प्रखर अखबारनवीस भी था, जिसकी बानगी हम प्रताप जैसे अख़बारों के सम्पादन में देख सकते हैं। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि एक महान विचारक के ये महत्वपूर्ण विचार देश के तथाकथित कर्णधारों के षडयंत्र के फलस्वरूप अब तक उन लोगों तक नहीं पहुच पाए जिनके लिए वह शहीद हुए थे।
सरकार का रवैया देखिये कि आजादी के लिए २३ साल की छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह को सरकार शहीद ही नहीं मानती है। इस बात पर एक बारगी यकीन करना मुश्किल है पर सरकारी कागजों में यही दर्ज है। एक आरटीआई से इसका खुलासा भी हुआ है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल में गृह मंत्रालय ने साफ किया है कि ऐसा कोई रिकार्ड नहीं कि भगत सिंह को कभी शहीद घोषित किया गया था।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें